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Nepal Politics: बालेन सरकार का बड़ा एक्शन, चार पूर्व प्रधानमंत्रियों की संपत्ति जांच से मचा सियासी भूचाल
- Reporter 12
- 30 Mar, 2026
नेपाल में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। चार पूर्व प्रधानमंत्रियों की संपत्ति की जांच शुरू होने और पूर्व मंत्री की गिरफ्तारी से सियासत गरमा गई है।
काठमांडू: नेपाल की नई सरकार ने सत्ता संभालते ही ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरे देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह उर्फ बालेन के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और कथित अवैध संपत्ति के मामलों पर सख्त रुख अपनाया गया है। इसी कड़ी में देश के चार पूर्व प्रधानमंत्रियों की संपत्ति की जांच शुरू किए जाने की खबर ने नेपाल की सियासत को गरमा दिया है। हालिया घटनाक्रम ने यह साफ संकेत दिया है कि नई सरकार पुराने सत्ता ढांचे और प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों पर भी कार्रवाई से पीछे हटने के मूड में नहीं है।
जांच के दायरे में जिन पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम सामने आए हैं, उनमें केपी शर्मा ओली, पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’, शेरबहादुर देउबा और माधव कुमार नेपाल शामिल बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही कुछ पूर्व मंत्रियों और उनके परिवारों की संपत्तियों की भी जांच होने की चर्चा है। इस कदम को नेपाल में सिस्टम की सफाई की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से वहां की राजनीति पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार और सत्ता संरक्षण के आरोप लगते रहे हैं।
प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने बेहद कम समय में जिस तरह सख्त प्रशासनिक संकेत दिए हैं, उसने समर्थकों और विरोधियों—दोनों को चौंकाया है। बताया जा रहा है कि कार्यभार संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर केंद्रीय जांच एजेंसियों ने पूर्व प्रधानमंत्रियों और प्रभावशाली नेताओं की संपत्तियों, आय के स्रोतों और उनसे जुड़े आर्थिक लेनदेन की पड़ताल शुरू कर दी। इस कार्रवाई को नई सरकार की प्राथमिकता सूची का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें भ्रष्टाचार, सत्ता दुरुपयोग और संदिग्ध संपत्ति अर्जन के मामलों को केंद्र में रखा गया है।
यह भी पढ़ें: नेपाल की नई सरकार के पहले 100 दिनों का एजेंडा क्या है, जानें पूरी रिपोर्ट।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पूर्व ऊर्जा मंत्री दीपक खडका की गिरफ्तारी ने मामला और ज्यादा गंभीर बना दिया है। बताया जा रहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसी ने उन्हें कथित मनी लॉन्ड्रिंग और आर्थिक अनियमितताओं से जुड़े मामले में हिरासत में लिया है। उनकी गिरफ्तारी को सिर्फ एक व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़े नेटवर्क की जांच की दिशा में बढ़ते कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
नेपाल की राजनीति में यह गिरफ्तारी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे यह संदेश गया है कि सरकार केवल बयानबाजी नहीं कर रही, बल्कि प्रभावशाली नामों पर भी हाथ डालने को तैयार है। इससे सत्ता और विपक्ष—दोनों खेमों में बेचैनी बढ़ी है।
जांच की जड़ में बीते वर्ष हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान सामने आए कुछ गंभीर आरोपों को माना जा रहा है। उस दौरान कुछ ऐसी तस्वीरें और वीडियो चर्चा में आए थे, जिनमें कथित तौर पर जली हुई नकदी और संदिग्ध आर्थिक गतिविधियों के संकेत दिखाई दिए थे। इन्हीं घटनाओं के बाद कुछ नेताओं, उनके परिवारों और सहयोगियों की आर्थिक पृष्ठभूमि पर सवाल तेज हुए। बाद में जांच एजेंसियों ने इन संकेतों को आधार बनाकर वित्तीय लेनदेन, चल-अचल संपत्तियों और आय के स्रोतों की पड़ताल शुरू की।
हालांकि, यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि जांच शुरू होना और दोष साबित होना—दो अलग-अलग बातें हैं। फिलहाल मामला जांच के दायरे में है और अंतिम निष्कर्ष आने में समय लग सकता है। लेकिन इतना तय है कि इस कार्रवाई ने नेपाल की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
यह भी पढ़ें: कौन हैं बालेन शाह? कैसे एक नए चेहरे ने नेपाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया।
नेपाल की राजनीति लंबे समय से कुछ बड़े चेहरों और दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में चार पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम जांच में आने का मतलब केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संदेश से भी है। यह संदेश यह है कि नई सरकार खुद को पुरानी व्यवस्था से अलग दिखाना चाहती है और वह अपनी पहचान भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख वाली सरकार के रूप में बनाना चाहती है।
बालेन शाह की लोकप्रियता पहले से ही युवा मतदाताओं और व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहे वर्गों में मजबूत रही है। ऐसे में सत्ता में आने के तुरंत बाद इस तरह की कार्रवाई उनके राजनीतिक नैरेटिव को और मजबूत करती है। इसे नेपाल में नई राजनीति बनाम पुरानी राजनीति की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है।
नई सरकार ने कथित भ्रष्टाचार, अवैध संपत्ति और सत्ता दुरुपयोग के मामलों की निगरानी के लिए एक विशेष ढांचा तैयार करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। चर्चा है कि वरिष्ठ नेताओं, पूर्व पदाधिकारियों और प्रभावशाली नौकरशाहों की संपत्तियों की जांच के लिए संस्थागत व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। इसका मकसद केवल छापामार कार्रवाई करना नहीं, बल्कि व्यवस्थित तरीके से पुराने मामलों की पड़ताल करना बताया जा रहा है।
यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ती है, तो नेपाल की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव है। लेकिन अगर यह कार्रवाई केवल चुनिंदा विरोधियों तक सीमित रह जाती है, तो इसके राजनीतिक दुष्प्रभाव भी सामने आ सकते हैं।
यह भी पढ़ें: नेपाल में Gen-Z आंदोलन के बाद कैसे बदली सत्ता की तस्वीर, पढ़ें पूरी टाइमलाइन।
इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद स्वाभाविक है कि विपक्षी दल और प्रभावित नेता इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताने की कोशिश कर सकते हैं। नेपाल जैसे संवेदनशील राजनीतिक माहौल में किसी भी बड़े एक्शन को केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक नजर से भी देखा जाता है। इसलिए आने वाले दिनों में यह बहस और तेज हो सकती है कि क्या सरकार वाकई भ्रष्टाचार पर प्रहार कर रही है या फिर अपने विरोधियों को कमजोर करने का रास्ता तलाश रही है।
हालांकि, सरकार के समर्थकों का तर्क है कि वर्षों से जनता यही चाहती थी कि बड़े नामों पर भी वही कानून लागू हो, जो आम लोगों पर लागू होता है। यही वजह है कि इस कार्रवाई को लेकर आम नागरिकों और युवाओं के बीच उत्सुकता भी काफी है।
यह पूरा घटनाक्रम नेपाल की राजनीति के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह सिर्फ कुछ गिरफ्तारियों या जांच आदेशों तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी असर हो सकते हैं। यदि जांच एजेंसियां मजबूत साक्ष्य जुटाती हैं और मामला आगे बढ़ता है, तो नेपाल के पुराने राजनीतिक ढांचे को बड़ा झटका लग सकता है। दूसरी ओर, यदि कार्रवाई बीच में धीमी पड़ती है या कानूनी रूप से कमजोर साबित होती है, तो सरकार की साख पर भी असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
नेपाल में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार ने सत्ता संभालते ही जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्रियों और प्रभावशाली नेताओं की संपत्तियों की जांच का रास्ता खोला है, उसने साफ कर दिया है कि आने वाले दिन राजनीतिक रूप से बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं। पूर्व मंत्री दीपक खडका की गिरफ्तारी और बड़े नामों की जांच ने यह संकेत दिया है कि नई सरकार अपने कड़े प्रशासन वाले वादे को जमीन पर उतारना चाहती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई नेपाल की राजनीति में वास्तविक शुद्धिकरण का रास्ता खोलेगी, या फिर यह भी एक और सियासी संघर्ष बनकर रह जाएगी। फिलहाल इतना तय है कि नेपाल की राजनीति एक नए और बेहद निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
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